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...तो केन्द्र अपना ले छत्तीसगढ़ का खाद्य सुरक्षा कानून

नई दिल्ली.मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने कहा है केन्द्र सरकार अगर देश के गरीबों की भलाई करना चाहती है, अगर उसमें गरीबों को हर दिन कम से कम दो वक्त भरपेट भोजन का अधिकार देने की इच्छा शक्ति है, अगर उसे इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर खाद्य़ सुरक्षा कानून लागू करना है, तो उसे खाद्य सुरक्षा अधिनियम का छत्तीसगढ़ का मॉडल तत्काल अपना लेना चाहिए। मुख्यमंत्री आज अपरान्ह नई दिल्ली में सेन्टर फॉर रिफॉर्म्स, डेव्लपमेंट एण्ड जस्टिस नामक संस्था द्वारा केन्द्र सरकार के प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा अधिनियम पर राष्ट्रीय संगोष्ठी को मुख्यवक्ता के रूप में सम्बोधित कर रहे थे। डॉ. रमन सिंह ने कहा कि केन्द्र सरकार ने हाल ही में खाद्य सुरक्षा अध्यादेश लागू किया है जिसे अभी संसद में प्रस्तुत किया जाना है। केन्द्र सरकार जब इस कानून को बनाने के लिए रायशुमारी कर रही थी, तब हमने छत्तीसगढ़ में अपने अनुभव के आधार पर प्रधानमंत्री जी को पत्र लिखकर और अन्य फोरम में भी सुझाव प्रस्तुत किए थे।
मुख्यमंत्री ने कहा कि लेकिन यह खेद का विषय है कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के प्रारूप को अंतिम रूप देते समय केन्द्र ने छत्तीसगढ़ के इन सुझावों पर ध्यान नहीं दिया। यदि वे छत्तीसगढ़ के खाद्य एवं एवं पोषण सुरक्षा कानून को मॉडल के रूप में अपना लेते, तो देश को एक अच्छा कानून मिल सकता था और खाद्य सुरक्षा प्रदान करने का लक्ष्य वास्तव में प्राप्त करना संभव हो पाता। केन्द्र सरकार अगर देश के गरीबों तक वास्तविक रूप से खाद्य सुरक्षा पहुंचाना चाहती है, तो उसे वे सभी प्रावधान करने होंगे जो छत्तीसगढ़ के खाद्य और पोषण (न्यूट्रीशनल) सुरक्षा कानून में हैं। केवल कानून लागू करने से ही खाद्य सुरक्षा हर गरीब परिवार तक नहीं पहुंच जाएगी। इसके लिए पहले केन्द्र को छत्तीसगढ़ की तरह कृषि उत्पादन, उपार्जन, भंडारण और वितरण का एक सम्पूर्ण तंत्र विकसित करना होगा और मौजूदा तंत्र को ठीक करना होगा। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के सारे लीकेज भरना होगा और समूचे तंत्र को पारदर्शी, जिम्मेदार और व्यावहारिक बनाना होगा। अनाजों के उत्पादन के पूरे तंत्र के प्रोत्साहन के लिए छत्तीसगढ़ सरकार ने किसानों के लिए अलग कृषि बजट बनाने से लेकर, एक प्रतिशत वार्षिक ब्याज पर किसानों को ऋण उपलब्ध कराने, सिंचाई यंत्रों पर 75 फीसदी तक सहायता प्रदान करने, किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त 270 रूपये बोनस प्रदान करने जैसे प्रावधान किए गए। उन्होंने कहा कि मैं हमेशा से यह कहते आया हूं कि जिस राज्य में एक भी व्यक्ति भूखा सोता है तो उस राज्य के मुख्यमंत्री को भी नींद नहीं आनी चाहिए। विकास और प्रगति के सारे पैमाने बेकार हैं अगर आप अपने राज्य के लोगों को भोजन का अधिकार न दे सकें।
डॉ. रमन सिंह ने कहा कि आज अगर पूरे देश में छत्तीसगढ़ की सार्वजनिक वितरण प्रणाली की चर्चा हो रही है, सर्वोच्च न्यायालय और योजना आयोग ने भी समय-समय पर इसे देश के अन्य राज्यों के लिए एक मॉडल के रूप में अपनाने की सलाह दी है, कई राज्यों के मंत्रियों और अधिकारियों ने छत्तीसगढ़ आकर इसका अध्ययन करने के बाद अपने-अपने राज्यों में जाकर इसकी तारीफ की है, तो हमारी पी.डी.एस. को मिली यह कामयाबी प्रदेश के शासन-प्रशासन सहित यहां की जनता के सहयोग और समर्थन का ही परिणाम है। मुख्यमंत्री ने कहा कि छत्तीसगढ़ ने देश का पहला खाद्य सुरक्षा कानून दिसम्बर 2012 में लागू किया है। सारा देश आज इसे उत्सुकता से देख रहा है और नोबल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन सहित अनेक जाने-माने बुद्धिजीवियों ने भी हमारे इस कानून पर सकारात्मक और उत्साहवर्धक अभिमत प्रकट किया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि आज अगर हमारी सार्वजनिक वितरण प्रणाली और हमारे खाद्य सुरक्षा कानून को देश के लिए एक मॉडल के रूप में देखा जा रहा है, तो यह सब जादू की छड़ी घुमाने से या केवल एक दिन में कानून बनाने से नहीं हुआ। इसके पीछे छत्तीसगढ़ में इस क्षेत्र में की गई हमारी लगभग दस वर्षों की तपस्या थी।
डॉ. रमन सिंह ने कहा कि प्रदेश सरकार ने छत्तीसगढ़ के पी.डी.एस. में कई महत्वपूर्ण सुधार किए, राशन दुकानों का निजीकरण समाप्त किया और कृषि उत्पादन, उचित मूल्य पर उसके उपार्जन सहित भण्डारण और वितरण व्यवस्था का एक पूरा सिस्टम तैयार किया। उसे आधुनिक सूचना प्रौद्योगिकी से जोड़कर पारदर्शिता के लिए वेबसाइट में प्रदर्शित किया। जनता की समस्याएं सुनने के लिए पीडीएस के तहत निःशुल्क कॉल सेन्टर बनाया। राशन सामग्री को पीडीएस की दुकानों तक पहंुचाने के लिए परिवहन व्यवस्था को अपने हाथों में लिया, दुकानों के निजीकरण को खत्म किया। मुख्यमंत्री ने कहा कि इन उपायों के बिना देश में न तो सार्वजनिक वितरण प्रणाली ठीक से चल सकती है और न ही राष्ट्रीय स्तर पर खाद्य सुरक्षा कानून लागू हो सकता है। उन्होने कहा कि छत्तीसगढ़ ने दस वर्षों की मेहनत और विगत पांच वर्षों से राज्य की जनता के लिए खाद्य सुरक्षा कानून बनाने का बड़ा होमवर्क करने के बाद इसे विधेयक के रूप में विधानसभा में प्रस्तुत किया, जहां पक्ष और विपक्ष के बीच गहन विचार-विमर्श के बाद इसे पारित किया गया और छत्तीसगढ़ में देश का पहला खाद्य सुरक्षा अधिनियम लागू हुआ, जबकि केन्द्र सरकार फिलहाल एक अध्यादेश के जरिए इस प्रकार का कानून लागू करने जा रही है।
मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि खाद्य सुरक्षा देश के प्रत्येक गरीब परिवार से जुड़ा हुआ विषय है। इसलिए मुझे आत्मिक संतोष होता है कि छत्तीसगढ़ में इस प्रकार का कानून लागू करके मुझे गरीब परिवारो के लिए कुछ बेहतर करने का अवसर मिला। डॉ. सिंह ने कहा कि दरअसल देश की जिस मेहनतकश आबादी के पसीने की बदौलत खेतों मंे फसल लहलहाती है, सड़कें बनती हैं, कारखाने चलते हैं और बाजारों में हमेशा रौनक रहती है, उस आबादी को हर दिन कम से कम दो वक्त का भरपेट भोजन मिले और भोजन के साथ-साथ जीवन जीने के लिए पौष्टिकता भी मिले, यह देखना समाज और सरकार दोनों की जिम्मेदारी है। छत्तीसगढ़ ने अपनी जिम्मेदारी को बखूबी समझा है। मैं बताना चाहूंगा कि सन् 1857 में देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में छत्तीसगढ़ में भी आजादी की लड़ाई का शंखनाद हुआ था और हमारे यहां आजादी का बिगुल फूंकने वाले महान क्रांतिकारी थे अमर शहीद वीर नारायण सिंह जिन्होंने सोनाखान की अपनी जमींदारी की जनता को अकाल के दिनों में भूख से बचाने के लिए कुछ सम्पन्न लोगों के अनाजों के भण्डार किसानों और गरीबों में वितरित कर दिए। फिर उन्होंने अंग्रेज हुकूमत को इसकी सूचना भी दी, लेकिन ब्रिटिश सरकार ने उनके इस कार्य को विद्रोह माना और उन्हें घेरने के लिए युद्ध शुरू कर दिया। वीर नारायण सिंह अंग्रेजों के खिलाफ बगावत में शहीद हो गए। यह छत्तीसगढ़ में स्वतंत्रता आन्दोलन की पहली कुर्बानी थी और उसके पीछे अकाल पीड़ित जनता को भूख से मुक्ति दिलाने की मानवीय करूणा से ओत-प्रोत भावना भी थी। संगोष्ठी में छत्तीसगढ़ के खाद्य सुरक्षा कानून पर राज्य सरकार के खाद्य सचिव श्री विकासशील ने प्रस्तुतिकरण दिया।
मुख्य वक्ता की आसंदी से संगोष्ठी में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने यह भी कहा कि छत्तीसगढ़ में हमने देश का जो पहला खाद्य सुरक्षा कानून बनाया है और इस कानून के लागू होने से पहले से भी हम अपने राज्य के गरीबों के लिए मात्र एक रूपए और दो रूपए किलो में हर महीने 35 किलो अनाज और निःशुल्क दो किलो नमक की योजना चला रहे थे तो जन कल्याण की इस योजना के पीछे भी हमारे महान शहीद वीर नारायण सिंह की प्रेरणा काम कर रही थी। हमारे यहां अंत्योदय परिवारों को मात्र एक रूपए किलो में और प्राथमिकता वाले परिवारों को दो रूपए किलो में अनाज देने की व्यवस्था पिछले करीब पांच वर्षों से चल रही है। इन दोनों तरह के परिवारों को नमक निःशुल्क दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि दरअसल सार्वजनिक वितरण प्रणाली का पूरा ढांचा आम जनता की सेवा के लिए खड़ा किया गया है। छत्तीसगढ़ सरकार ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली की आर्थिक जरूरतों को समझा और ग्राम पंचायतों तथा महिला स्व-सहायता समूहों को दुकान संचालन के लिए वर्ष 2005-06 में 42 करोड़ रूपए का ब्याज मुक्त ऋण उपलब्ध कराया। पीडीएस को लेकर देश में अब तक जितने भी सर्वेक्षण हुए हैं, उनमें राशन की सबसे ज्यादा चोरी परिवहन के दौरान होना बताया गया है। इसे ध्यान में रखकर राज्य सरकार ने वर्ष 2006 में राशन परिवहन की व्यवस्था अपने हाथों में सम्हाली और छत्तीसगढ़ स्टेट सिविल सप्लाई कार्पोरेशन के जरिए सीधे राशन दुकानों तक सामग्री पहुंचाने की व्यवस्था भी राज्य शासन द्वारा की गई। इसके लिए छत्तीसगढ़ सरकार लगभग 90 करोड़ का अनुदान दे रही है।
डॉ. रमन सिंह ने कहा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिन पर 25 दिसंबर सन् 2000 को देश में अन्त्योदय अन्न योजना की घोषणा हुई थी। यह योजना गरीबों में भी सबसे गरीब लोगों के लिए निश्चित रूप से वरदान है। इस योजना के संचालन और वर्ष 2007 में पीडीएस के सुधार कार्य के दौरान हमें यह सीख मिली कि राशन जितना सस्ता और गरीबों की क्रय शक्ति के अन्दर होगा, हमारी उस प्रणाली में राशन सामग्री उतनी ही बेहतर ढंग से गरीबों तक पहुंचेगी। दूसरी सीख यह मिली कि हर गरीब और जरूरतमंद को सस्ता अनाज देने की व्यवस्था से राशन दुकानों की निगरानी जनता स्वयं करने लगेगी। डॉ. रमन सिंह ने संगोष्ठी में बताया कि छत्तीसगढ़ में केवल 18 लाख 75 हजार बीपीएल परिवारों के लिए अनाज मिल रहा था, जबकि जरूरत इससे कहीं ज्यादा की थी। हमने केन्द्र सरकार से राज्य के हर गरीब और जरूरतमंद परिवार के लिए बीपीएल अनाज का कोटा बढ़ाने की लगातार मांग की, लेकिन केन्द्र ने अतिरिक्त अनाज देने से मना कर दिया। इस पर छत्तीसगढ़ सरकार ने यह निर्णय लिया कि केन्द्र भले ही हमें जरूरत के मुताबिक अनाज न दे, लेकिन हम अपने राज्य के प्रत्येक गरीब और जरूरतमंद परिवार को हर महीने 35 किलो अनाज देंगे। हमारे इसी संकल्प की बुनियाद पर छत्तीसगढ़ में अप्रैल 2007 में मुख्यमंत्री खाद्यान्न सहायता योजना की शुरूआत हुई। यह राज्य में हर गरीब को भोजन का अधिकार दिलाने के लिए प्रदेश सरकार का सबसे मजबूत कदम था।
मुख्यमंत्री खाद्यान्न सहायता योजना के संचालन में विगत पांच वर्षों में राज्य सरकार ने स्वयं के संसाधनों से पांच हजार 300 करोड़ रूपए खर्च किए हैं, इस वजह से राज्य के लगभग 65 प्रतिशत गरीब परिवारों को खाद्य सुरक्षा मिली है और राज्य की सरकार पर तथा हमारी सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर उनका भरोसा लगातार बढ़ता गया है। डॉ. सिंह ने कहा कि छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री खाद्यान्न सहायता योजना के लगभग एक वर्ष तक सुचारू संचालन के बाद खाद्य सुरक्षा कानून बनाने और उसे लागू करने की प्रक्रिया शुरू हुई। हमने पीडीएस में सुधार, स्थिरता और पारदर्शिता के लिए कुछ नये प्रयोग किए। वर्ष 2007-08 में छत्तीसगढ़ ने अपनी पीडीएस का कम्प्यूटरीकरण किया। यह पूरे देश में एक सबसे अभिनव प्रयास था। हमारे इस प्रयास को सफलता मिली और राष्ट्रीय ई-गवर्नेस पुरस्कार सहित आधा दर्जन राष्ट्रीय एवार्ड प्राप्त हुए। उन्होंने कहा कि राज्य में खाद्य सुरक्षा कानून लागू करने की प्रक्रिया वर्ष 2008 से चल रही थी, जब इसका पहला प्रारूप तैयार किया गया था। छत्तीसगढ़ में आम जनता के लिए खाद्य सुरक्षा के ढांचे को अधिक से अधिक मजबूत बनाने के लिए सुधारों का सिलसिला पिछले करीब दस वर्षों से चल रहा है। इन्हीं सुधारों की एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में छत्तीसगढ़ खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2012 को लागू किया गया है।
मुख्यमंत्री ने बताया कि राज्य के 50 लाख परिवारों को यानि कुल आबादी के लगभग 90 प्रतिशत हिस्से को इसमें शामिल किया गया है। इनमें 11 लाख अन्त्योदय परिवार और 31 लाख बीपीएल परिवार मिलाकर कुल प्राथमिकता वाले 42 लाख परिवार शामिल हैं। इनके अलावा आठ लाख परिवार एपीएल श्रेणी के हैं। प्राथमिकता वाले 42 लाख परिवारों में से अन्त्योदय परिवारों को मात्र एक रूपए किलो और बीपीएल परिवारों को केवल दो रूपए किलो में हर महीने 35 किलो अनाज और दो किलो निःशुल्क नमक देने का प्रावधान किया गया है। हमने छत्तीसगढ़ के खाद्य सुरक्षा कानून में आदिवासी क्षेत्रों में पांच रूपए किलो में दो किलो चना और गैर आदिवासी क्षेत्रों में दस रूपए किलो में दो किलो दाल देने की भी व्यवस्था की है। चना और दाल दोनों प्रोटीन के भण्डार होते हैं और प्रोटीन मानव जीवन को पोषण सुरक्षा देता है। इसलिए हमने विधानसभा के शीतकालीन सत्र में 21 दिसम्बर 2012 को जिस खाद्य सुरक्षा कानून का विधेयक विधानसभा में सर्वसम्मति से पारित किया था, जनवरी 2013 में उसके अधिनियम बन जाने के बाद अब उसमें पोषण सुरक्षा को जोड़ने का विधेयक भी हमने जुलाई 2013 के मानसून सत्र में पारित किया है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि छत्तीसगढ़ का यह खाद्य सुरक्षा कानून दुनिया को भूख और कुपोषण से मुक्ति दिलाने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा घोषित सहस्त्राब्दि विकास के लक्ष्यों (मिलेनियम डेव्हलपमेंट गोल्स) को पूर्ण करने में भी सहायक होगा। हमारा यह खाद्य सुरक्षा कानून एक स्वस्थ और समृद्ध छत्तीसगढ़ के निर्माण में उत्प्रेरक का भी काम करेगा। डॉ. रमन सिंह ने कहा कि पिछले कुछ बरसों से भारत का मीडिया इस बात को इतिहास में लगातार दर्ज करते आया है कि किस तरह कुछ सामाजिक कार्यकर्ता दूसरे कुछ मुद्दों पर छत्तीसगढ़ सरकार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में खड़े होते हैं, लेकिन वे और उनके बड़े-बड़े वकील खाद्यान्न सुरक्षा के मामले मेें उसी सुप्रीम कोर्ट में उसी छत्तीसगढ़ सरकार के काम की सराहना करते हुए पूरे देश में उसके मॉडल को लागू करवाने के लिए अदालत से अपील करते भी नजë
 
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